E-Paperटॉप न्यूज़देशराजनीतिराजस्थानराज्यलोकल न्यूज़

कहानी एक अनसुनी पीड़ा की: NHM प्रबंधक वर्ग और ‘तारीख पर तारीख

आसींद संवाददाता विजयपाल सिंह राठौड़ आसींद /राजस्थान के राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM) के अंतर्गत कार्यरत प्रबंधक वर्ग (Management Cadre) के संविदा कार्मिकों की स्थिति आज एक ऐसे मोड़ पर है, जहाँ उम्मीदें तो बहुत हैं, लेकिन धरातल पर परिणाम अब भी अधूरे हैं। वर्ष 2025 में भी जब अन्य कई संवर्गों के नियमितीकरण की खबरें आती हैं, तो यह वर्ग खुद को ठगा सा महसूस करता है।

​राजस्थान के स्वास्थ्य ढांचे की रीढ़ कहे जाने वाले NHM में जहां डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ मरीजों का इलाज करते हैं, वहीं पूरी व्यवस्था को कागजों से लेकर धरातल तक चलाने का जिम्मा प्रबंधक वर्ग (DEO,DPM, DAM, BPM, BAM और अन्य) के कंधों पर होता है। लेकिन विडंबना देखिए, दूसरों की फाइलों को व्यवस्थित करने वाले इन कार्मिकों की अपनी ‘नियमितीकरण की फाइल’ सालों से धूल फांक रही है।
​1. 2026का साल: नई उम्मीदें, पुराने घाव
​2025 की शुरुआत के साथ ही संविदा कार्मिकों को उम्मीद थी कि सरकार ‘राजस्थान कॉन्ट्रैक्चुअल हायरिंग टू सिविल पोस्ट रूल्स-2022’ के तहत उनके लिए कोई बड़ा ऐलान करेगी। सरकार ने बजट में अनुभव की गणना में छूट और मानदेय वृद्धि की बातें तो कीं, लेकिन ‘नियमितीकरण’ शब्द NHM के मैनेजमेंट कैडर के लिए अब भी एक सपना बना हुआ है।
​2. मैनेजमेंट कैडर की मुख्य समस्याएं
​समान काम, असमान दर्जा: एक ही ऑफिस में बैठने वाले नियमित अधिकारी और संविदा प्रबंधक के काम में कोई अंतर नहीं है, लेकिन सुविधाओं और भविष्य की सुरक्षा के मामले में जमीन-आसमान का अंतर है।
​अनुभव की अनदेखी: कई कार्मिक 10 से 15 वर्षों से सेवाएं दे रहे हैं। कोर्ट के कई फैसलों के बावजूद, प्रशासनिक जटिलताओं के कारण इनकी स्क्रीनिंग प्रक्रिया अटकी हुई है।
​नाममात्र का वेतन: महंगाई के इस दौर में, प्रबंधकीय जिम्मेदारी निभाने के बावजूद इनका मानदेय आज भी सम्मानजनक स्तर से काफी नीचे है।
​3. ‘सिविल पोस्ट रूल्स 2022’ का उलझा हुआ जाल
​सरकार ने संविदा कर्मियों को नियमित करने के लिए जो 2022 के नियम बनाए थे, उनमें सबसे बड़ी बाधा ‘पदों का सृजन’ और ‘अनुभव की गणना’ है। NHM के प्रबंधक वर्ग का आरोप है कि सरकार तकनीकी पेच फंसाकर उन्हें कैडर में शामिल करने से बच रही है। 2025 के ताजा आदेशों में कुछ नर्सिंग और पैरामेडिकल पदों की स्क्रीनिंग तो शुरू हुई, लेकिन प्रबंधन वर्ग को फिर से ‘अगली बार’ के भरोसे छोड़ दिया गया।
​निष्कर्ष: कब खत्म होगा वनवास?
​राजस्थान का NHM प्रबंधक वर्ग आज एक ऐसे चौराहे पर खड़ा है, जहाँ उसे अपने ही विभाग के भीतर ‘बेगाना’ समझा जा रहा है। 2025 का साल बीतने को है, चुनावी वादे और बजट घोषणाएं ठंडी पड़ चुकी हैं। सवाल यह है कि क्या सरकार इन कुशल प्रबंधकों की योग्यता को सम्मान देगी, या फिर इनका ‘संविदा’ का ठप्पा सेवानिवृत्ति तक साथ चलेगा?

2023 के अंत में राजस्थान में भाजपा सरकार (भजनलाल शर्मा सरकार) के आने के बाद से संविदा कार्मिकों के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाएगी, लेकिन नियमितीकरण (Permanent) की मांग अभी भी एक बड़ा संघर्ष बनी हुई है।
​भाजपा सरकार द्वारा अब तक किए गए प्रमुख कार्य निम्नलिखित हैं:ओर उन की हकीकत
​1. सालाना 5% मानदेय वृद्धि (इंक्रीमेंट)
​सरकार ने संविदा कर्मियों के लिए एक व्यवस्थित इंक्रीमेंट नीति लागू की है। अब संविदा कर्मियों को सरकारी कर्मचारियों की तर्ज पर वर्ष में दो बार (1 जनवरी और 1 जुलाई) उनकी नियुक्ति तिथि के आधार पर 5% वार्षिक वेतन वृद्धि का लाभ दिया जाना है। यह 2025 से पूरी तरह प्रभावी हो गया है। पर हकीकत से कोसों दूर है पिछले 2 साल यह 5 प्रतिशत भी अभी नही मिला
​2. ‘सिविल पोस्ट रूल्स 2022’ में संशोधन और स्क्रीनिंग ​पूर्ववर्ती सरकार द्वारा बनाए गए Rajasthan Contractual Hiring to Civil Posts Rules, 2022 को भाजपा सरकार ने आगे बढ़ाया है।
​सरकार ने विभिन्न विभागों (विशेषकर स्वास्थ्य और शिक्षा) में स्क्रीनिंग प्रक्रिया तेज की है।​दिसंबर 2024 तक कई विभागों को पात्र संविदा कर्मियों की सूची वित्त विभाग को भेजने के निर्देश दिए गए थे। हकीकत केवल कागजों तक ही धरातल पर अभी कुछ नहीं
​3. NHM और अन्य विभागों में नई नियुक्तियां ​सरकार ने संविदा के पुराने पदों को भरने और नए पदों के सृजन पर ध्यान दिया है:
​NHM और राजमेस (RajMES): 2025 में फार्मासिस्ट, महिला स्वास्थ्य कार्यकर्ता (ANM), और सामुदायिक स्वास्थ्य अधिकारियों (CHO) के हजारों पदों पर भर्ती और दस्तावेज सत्यापन की प्रक्रिया पूरी की गई है। पर यह मैनेजमेंट कैडर नहीं
​प्रबंधन वर्ग के लिए अपडेट: हाल ही में (नवंबर-दिसंबर 2025) स्वास्थ्य विभाग ने ब्लॉक हेल्थ सुपरवाइजर, डिस्ट्रिक्ट प्रोग्राम कोऑर्डिनेटर और डिस्ट्रिक्ट क्वालिटी मैनेजर्स जैसे 1,578 पदों के लिए सरकार को प्रस्ताव भेजा है, ताकि इस वर्ग की कमी को दूर किया जा सके। हकीकत सरकार को केवल मजदूर चाहिए़ जो कम वेतन में काम कर सके
​4. अनुभव की गणना में राहत
​संविदा कर्मियों की एक बड़ी मांग थी कि उनके पुराने अनुभव को नियमितीकरण के लिए गिना जाए। भाजपा सरकार ने बजट 2024-25 में संकेत दिए थे कि अनुभव की गणना की जटिलताओं को दूर कर उन्हें ‘पेंशन और अन्य सुरक्षा कवच’ के दायरे में लाने की योजना बनाई जा रही है। हकीकत भाजपा सरकार ने बजट सत्र 2025 -26 में 2वर्ष की छूट का आदेश अभी तक नहीं दिया
​5. अदालती फैसलों का क्रियान्वयन
​मार्च 2025 में सुप्रीम कोर्ट के एक महत्वपूर्ण फैसले के बाद, राज्य सरकार ने कुछ विशेष संवर्गों के संविदा कर्मियों को स्थायी करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। सरकार ने कोर्ट में यह पक्ष रखा है कि वे चरणबद्ध तरीके से पात्र कर्मचारियों को नियमित करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। हकीकत 2 वर्ष के कार्यकाल में एक भी मैनेजमेंट कैडर का कार्मिक नियमित नहीं हुआ
​मैनेजमेंट कैडर के लिए क्या बदला?
​सच यह है कि मैनेजमेंट कैडर (DPM, BPM, DEO आदि) के लिए सरकार ने अभी तक केवल “भर्तियों और मानदेय वृद्धि” पर ध्यान दिया है। पूर्ण नियमितीकरण के लिए इस वर्ग को अभी भी ‘कैडर री-स्ट्रक्चरिंग’ का इंतजार है।

भाजपा सरकार के कार्यकाल के वे बिंदु हैं जहाँ संविदा कर्मी असंतुष्ट हैं:
​1. पूर्ण नियमितीकरण का अभाव (No Permanent Status)
​सरकार ने मानदेय नहीं बढ़ाया है, लेकिन “नियमितीकरण” (Regularization) के मुद्दे पर स्थिति अभी भी स्पष्ट नहीं है। सिविल पोस्ट रूल्स-2022 के तहत केवल “संविदा सेवा नियमों” में शामिल किया गया है, जिसका अर्थ यह नहीं है कि वे स्थायी सरकारी कर्मचारी बन गए हैं। उन्हें आज भी रिटायरमेंट के बाद पेंशन या ग्रेच्युटी जैसी सुविधाएं नहीं मिल रही हैं।
​2. मैनेजमेंट कैडर की अनदेखी (Step-motherly Treatment)
​सरकार का पूरा ध्यान नर्सिंग और पैरामेडिकल स्टाफ पर रहा है। NHM के प्रबंधक वर्ग (DPM, BPM, DAM, BAM,DEO) जो योजनाओं को लागू करते हैं, उनके लिए कोई अलग से कैडर री-स्ट्रक्चरिंग नहीं की गई। उन्हें आज भी ‘एडमिनिस्ट्रेटिव’ बताकर नियमितीकरण की मुख्य धारा से बाहर रखा जा रहा है।
​3. ‘अनुभव गणना’ का पुराना पेच (Experience Counting Issue)
​भाजपा सरकार ने अभी तक उस 3:1 या 2:1 के फॉर्मूले को पूरी तरह खत्म नहीं किया है, जिसमें संविदा के 3 साल को नियमित के 1 साल के बराबर माना जाता है। इससे 15-15 साल से काम कर रहे अनुभवी कार्मिकों का सीनियरिटी लेवल बहुत नीचे चला गया है।
​4. ‘समान कार्य-समान वेतन’ की अनदेखी
​सुप्रीम कोर्ट के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद, सरकार ने संविदा कर्मियों को उनके समकक्ष नियमित कर्मचारियों के न्यूनतम वेतनमान के बराबर वेतन नहीं दिया है। 5-10% की वृद्धि ऊंट के मुंह में जीरे के समान है, क्योंकि महंगाई दर इससे कहीं अधिक है।
​5. बोनस अंकों का विवाद
​नई भर्तियों में संविदा पर काम कर रहे पुराने कर्मचारियों को मिलने वाले बोनस अंकों को लेकर सरकार की नीति स्पष्ट नहीं रही है। इससे कई पुराने अनुभवी कार्मिक नई भर्ती परीक्षाओं में बाहर हो रहे हैं, जबकि वे सालों से विभाग को अपनी सेवाएं दे रहे हैं।
​6. सुरक्षा और भत्तों का अभाव
​नियमित कर्मचारियों को मिलने वाले मकान किराया भत्ता (HRA), चिकित्सा सुविधा (RGHS का पूर्ण लाभ) और अन्य भत्ते संविदा प्रबंधन वर्ग को आज भी नहीं मिल रहे हैं। 2025 में भी वे केवल एक “फिक्स्ड मानदेय” पर काम कर रहे हैं।
​7. कार्य का भारी दबाव और छंटनी का डर
​सरकार ने नई योजनाओं (जैसे विकसित भारत संकल्प यात्रा आदि) का पूरा बोझ संविदा प्रबंधन वर्ग पर डाल दिया है, लेकिन उनकी जॉब सिक्योरिटी सुनिश्चित नहीं की। संविदा की अवधि हर साल बढ़ाने की ‘तलवार’ हमेशा उन पर लटकी रहती है।

*NHM के ‘सॉफ्टवेयर वॉरियर्स’ बदहाली में: आधा दर्जन से ज्यादा पोर्टल्स का बोझ, पर जेब में सिर्फ ₹13,150*
​राजस्थान स्वास्थ्य विभाग की कोई भी योजना तब तक कागजों से बाहर नहीं निकलती, जब तक उसे NHM का डाटा एंट्री ऑपरेटर सिस्टम पर ‘लाइव’ नहीं करता। आज प्रदेश के स्वास्थ्य ढांचे में एक-दो नहीं, बल्कि आधा दर्जन से अधिक जटिल सॉफ्टवेयर का संचालन पूरी तरह से इन अल्पवेतन भोगी संविदा कर्मियों के भरोसे है।
​इन कठिन सॉफ्टवेयर्स के ‘मास्टर’ हैं ये ऑपरेटर्स:
​एक डाटा एंट्री ऑपरेटर को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना पड़ता है:
​PCTS (पीसीटीएस): गर्भवती महिलाओं और बच्चों के टीकाकरण का पूरा हिसाब।
​AB-PMJAY (आयुष्मान भारत): करोड़ों के फ्री इलाज वाले दावों की एंट्री।
​ODF/IHHL पोर्टल: स्वच्छता अभियान से जुड़ा डेटा।
​HWC पोर्टल: हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर की डेली रिपोर्टिंग।
​e-Aushadhi: दवाओं का स्टॉक और वितरण का मैनेजमेंट।
​IDSP: बीमारियों की निगरानी और रियल-टाइम डेटा फीडिंग।
​PFMS/RajKosh: वित्तीय भुगतान और बजट का लेखा-जोखा।
​तकनीकी काम, पर दिहाड़ी मजदूरों जैसा दाम
​हैरानी की बात यह है कि इन सॉफ्टवेयर्स को चलाने के लिए उच्च तकनीकी समझ की आवश्यकता होती है। ज़रा सी गलती होने पर पूरे जिले या ब्लॉक की रैंकिंग गिर जाती है, जिसके लिए अधिकारियों की डांट भी यही ऑपरेटर झेलते हैं।
​”इतना स्किल्ड काम करने के बावजूद इनका वेतन सिर्फ ₹13,150 फिक्स कर दिया गया है। सरकार को समझना चाहिए कि ये सिर्फ टाइपिंग नहीं कर रहे, बल्कि पूरे सिस्टम का डेटा मैनेजमेंट कर रहे हैं।”
​शोषण की पराकाष्ठा: भाजपा सरकार से सवाल
​2025 में भी इन ऑपरेटर्स को ‘आईटी प्रोफेशनल’ की श्रेणी में रखने के बजाय केवल संविदाकर्मी मानकर छोड़ दिया गया है।
​सवाल: जब काम हाई-टेक सॉफ्टवेयर पर है, तो वेतन लो-टेक (Low-tech) क्यों?
​सवाल: क्या ₹13,150 में एक कंप्यूटर एक्सपर्ट का घर चल सकता है?
​सवाल: नियमितीकरण की प्रक्रिया में इन ‘डिजिटल स्तंभों’ को सबसे पीछे क्यों रखा गया है?

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button
error: Content is protected !!