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अरावली पर्वतमाला की पुकार

हमारी जीवन रक्षक

अरावली पर्वतीय श्रृंखला केवल पत्थरों और पहाड़ियों का समूह और ऊंचाइयों का नाम नहीं है, बल्कि उत्तर भारत के जीवन, पर्यावरण और जलवायु संतुलन की रीढ़ है।यह दुनिया की सबसे प्राचीन पर्वतमालाओं में से एक है, जिसने हजारों वर्षों से मरुस्थल को आगे बढ़ने से रोका, भूजल को संजोया और मानव जीवन को सुरक्षित रखा।

अरावली का भू-भौगोलिक महत्व असाधारण है। यह थार मरुस्थल और उपजाऊ मैदानी क्षेत्रों के बीच एक प्राकृतिक दीवार है। यदि यह दीवार कमजोर हुई, तो राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को रेगिस्तान बनने से कोई नहीं रोक पाएगा।अरावली वर्षा जल को रोककर उसे जमीन के भीतर पहुंचाती है, जिससे कुएँ, बावड़ियाँ और भूजल स्रोत जीवित रहते हैं। *यही पर्वतमाला लू, धूल भरी आँधियों और बढ़ते तापमान से करोड़ों लोगों की रक्षा करती है।

इस संदर्भ में यह *नई परिभाषा कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली पहाड़ियों को अरावली नहीं माना जाएगा, अत्यंत खतरनाक और अदूरदर्शी है। अरावली की पहचान केवल ऊँचाई से नहीं, बल्कि उसकी भूवैज्ञानिक संरचना, पारिस्थितिकी तंत्र और निरंतरता (continuity) से होती है। अरावली की अधिकांश पहाड़ियाँ स्वाभाविक रूप से कम ऊँचाई की हैं, लेकिन उनका पर्यावरणीय योगदान किसी ऊँचे पर्वत से कम नहीं है। इस मनमानी परिभाषा से अरावली को टुकड़ो में तोड़ने की साजिश है, खनन माफिया और रियल एस्टेट के लिए रास्ता खुलेगा, जिससे जंगल कटेंगे, जलस्रोत सूखेंगे और प्रदूषण कई गुना बढ़ेगा।

100 मीटर की परिभाषा लिखने वाले के हाथों की पांचों उंगलियों भी जब बराबर की नहीं तो क्या तुम्हारी भी छोटी उंगली को काट दिया जावे, तो फिर किसने हक दिया तुम्हें प्रकृति की बनाई चीजो को मिटाने का।
100 मीटर की सीमा कोई वैज्ञानिक मापदंड नहीं विनाश का मापदंड है, यदि आज अरावली को कागज़ी परिभाषाओं में खत्म कर दिया गया, तो आने वाली पीढ़ियों को सूखा, गर्मी, जल संकट और जहरीली हवा विरासत में मिलेगी।

अरावली को बचाना केवल पर्यावरण का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन, आजीविका और भविष्य को बचाने की लड़ाई है।
हमारी मांग है कि अरावली की ऊंचाई को फीते से नहीं उसके पर्यावरण के योगदान से नापा जाये। सभी पहाड़ियों—चाहे वे 50 मीटर की हों या 500 मीटर की—को पूर्ण संरक्षण मिले, और खनन व अंधाधुंध निर्माण पर सख्त रोक लगे।

पहले CTH के नाम पर सरिस्का और अब 100 मीटर की ऊँचाई के नाम पर अरावली को खत्म करने के पीछे कौन है जो पर्दे के पीछे जो सारा खेल खेल रहा है।

यह सिर्फ पहाड़ों की नहीं, हमारे अस्तित्व को बचाने की लड़ाई है।
अरावली बचेगी तो भारत बचेगा।
अरावली नहीं तो भविष्य नहीं।

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