
ब्यावर संवाददाता तरनदीप सिंह
ब्यावर के मसूदा रोड स्थित प्रभु की बगिया में श्री जगन्नाथ भक्त मंडल के सानिध्य में अयोध्या के संत एवं गौभक्त उमाशंकर दास महाराज के मुखारबिंद से आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के सप्तम एवं अंतिम दिवस दान की महिमा पर विशेष प्रकाश डाला गया।
कथावाचक महाराज ने कहा कि दान देकर भूल जाना चाहिए, लेकिन आज लोग दान या सहयोग का ढिंढोरा पीटते हैं और अपने वर्चस्व का प्रदर्शन करते हैं। ऐसे दिखावे वाले दान से पुण्य की प्राप्ति नहीं होती। उन्होंने महादानी दधीचि, राजा रघु एवं भृगु ऋषि जैसे उदाहरणों के माध्यम से सच्चे दान की महिमा को समझाया।
महाराज ने कहा कि यह सोच आवश्यक है कि ईश्वर ने हमें जो दिया है, उसमें से हमने क्या दान किया। उन्होंने जीवन में संवाद की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा कि संवाद की कमी ही विवाद की जड़ होती है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यदि राजा दशरथ भगवान राम को वनवास भेजने से पहले परिवार से संवाद कर लेते, तो यह परिस्थिति ही उत्पन्न नहीं होती।
गौ सेवा पर बोलते हुए महाराज ने कहा कि गौ सेवा अत्यंत पुण्य का कार्य है। उन्होंने बताया कि 1947 में देश की जनसंख्या लगभग 33 करोड़ थी, जबकि गौवंश उससे कहीं अधिक था। आज देश की आबादी 140 करोड़ से अधिक हो गई है, लेकिन गौवंश घटकर लगभग 10 करोड़ रह गया है। इसी कारण हमें रासायनिक युक्त दूध का सेवन करना पड़ रहा है। आज समाज को गौ सेवा की अत्यंत आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि कर्ज लेकर भी गौ माता की सेवा करनी पड़े, तो वह भी करनी चाहिए।
महाराज ने यह भी बताया कि राजा दिलीप के वंश में संतान की प्राप्ति भी गौ सेवा से ही हुई थी, जो गौ माता की महिमा को दर्शाता है।
कथा के दौरान वृंदावन से पधारे संत गोपेश कृष्ण दास महाराज, जो देशभर में लगभग 400 गौशालाओं का संचालन कर रहे हैं, ने भी श्रद्धालुओं को संबोधित कर गौ सेवा के महत्व पर अपने विचार रखे।
कथा के अंतिम दिन श्रद्धालुओं की भारी उपस्थिति रही और वातावरण भक्तिमय बना रहा।




