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श्रीमाधोपुर के लोक-लाड़ले फड़-चित्रकार आस्तिक तिवारी की कला-साधना

फड़ कला के संरक्षण से स्वायत्त शासन विभाग भी हुआ अभिभूत

दैनिक राजस्थान समाचार संवाददाता प्रदीप कुमार शर्मा,गढ़टकनेत-अजीतगढ़। श्रीमाधोपुर के प्रतिभाशाली युवा आस्तिक तिवारी (पुत्र – लक्ष्मीकांत तिवारी), उम्र मात्र 18 वर्ष, ने राजस्थान की धरोहर फड़ चित्रकला को नई ऊर्जा देने का संकल्प लिया है। आधुनिक युग में जहां लोक कलाएं विलुप्ति की कगार पर हैं, वहीं आस्तिक ने अपने हुनर और समर्पण से इस प्राचीन कला को पुनर्जीवित करने का बीड़ा उठा रखा है।

आस्तिक तिवारी के अनुसार वे कपड़े और कैनवास पर देवताओं, ऐतिहासिक महापुरुषों एवं महाकाव्यों से संबंधित कथाओं को चित्रित करते हैं। वे पारंपरिक शैली में वनस्पति रंगों का उपयोग करते हुए लम्बे कपड़े पर फड़ों को जीवंत रूप देते हैं। उनका कहना है कि फड़ केवल एक चित्रकला नहीं, बल्कि राजस्थान की संस्कृति व परंपरा का गर्वीला प्रतीक है।

कलाकार आस्तिक बताते हैं कि इस कला-साधना में अधिक समय और धन की आवश्यकता होती है, लेकिन उनके माता-पिता ने सदैव उनका उत्साह बढ़ाया है। उनकी प्रतिभा को विभिन्न मंचों पर सराहा भी गया है।
राजस्थान में फड़ कला में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर 50,000 रुपये का पुरस्कार।
माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा 11,000 रुपये का सम्मान।
शेखावाटी युवा महोत्सव में राज्य, संभाग, जिला एवं ब्लॉक स्तर पर सम्मान।
आस्तिक तिवारी का कहना है कि फड़ चित्रकला को संरक्षित और प्रोत्साहित करने की अत्यंत आवश्यकता है, जिसके लिए समाज के भामाशाहों को आगे आना चाहिए। फड़ कला भारत की प्राचीन लोककलाओं में से एक है, जिसमें कथाओं को चित्रों के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। इन फड़ों को लोकदेवताओं के पुजारी, जिन्हें भोपा कहा जाता है, अपने साथ लेकर चलते हैं। इसे आधुनिक भाषा में चल-मंदिर या मोबाइल टेंपल भी कहा जा सकता है।

युवा कलाकार की इस अनूठी कला-साधना ने स्वायत्त शासन विभाग का भी ध्यान आकर्षित किया है और विभाग आस्तिक के कार्यों से विशेष रूप से प्रभावित हुआ है।

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