दैनिक राजस्थान समाचार नागपाल शर्मा माचाड़ी। पत्रकारिता यह महज़ एक पेशा नहीं, बल्कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, जो हर नागरिक के मौलिक अधिकार—जानने के अधिकार—की रक्षा करता है। हमारा काम सिर्फ़ खबरें पहुँचाना नहीं, बल्कि उन लोगों की आवाज़ बनना है, जिनके अधिकारों का हनन हो रहा है, उन्हें सशक्त करना है। हम मानवाधिकार उल्लंघनों को बेनकाब करते हैं, सत्ता को जवाबदेह बनाते हैं। पर जब बात हमारे, पत्रकारों की सुरक्षा और हमारे मानवाधिकारों के हनन की हो, तो सवाल उठता है।
*आखिर जवाबदेही किसकी..?*
आज पत्रकारिता उच्च जोखिम और कम वेतन का पर्याय बन चुकी है। काम के असीमित घंटे और निरंतर जानलेवा धमकियाँ हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी का हिस्सा हैं। बावजूद इसके, हम सच के साथ डटे हैं, पर आखिर कब तक? पिछले दस वर्षों में देश में पत्रकारों पर हमलों और हत्याओं के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं, सच्चाई और सच बोलने वालों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है।
*पत्रकारों पर हमले: राष्ट्रीय शर्म का विषय*
गत सप्ताह राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) द्वारा केरल, मणिपुर और त्रिपुरा में तीन पत्रकारों पर हुए जानलेवा हमलों का स्वतः संज्ञान लेना, देर से ही सही, एक स्वागत योग्य पहल है। यह गंभीर विषय है, जिसके आगे की घटनाएँ तो सिर्फ़ एक बानगी हैं।
*त्रिपुरा:-* एक राजनीतिक दल के कार्यक्रम की कवरेज के दौरान लाठियों और धारदार हथियारों से जानलेवा हमला।
* मणिपुर: पुष्प उत्सव की कवरेज के दौरान एक पत्रकार को एयर गन से दो बार गोली मारी गई।
* केरल: थौदुपुझा के पास लोगों के एक समूह द्वारा हमला।
अफसोस है कि इससे पहले देश के विभिन्न हिस्सों में हुए कई जानलेवा हमलों पर आयोग ने चुप्पी साधे रखी!
*दंडमुक्ति का भयानक चक्र*
आज पत्रकारिता की सच्चाई यह है कि जान का खतरा देखकर कई पत्रकार संवेदनशील मुद्दों पर रिपोर्टिंग करने से पीछे हटने लगे हैं! ‘कमिटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स’ के आँकड़े भयावह हैं: 1992 से अब तक 1400 से अधिक पत्रकारों की हत्या की गई, जिनमें से 890 से अधिक हत्यारों को कभी न्याय के कटघरे में लाया ही नहीं गया! यह दोषियों को दंड से मुक्ति देने के ही समान है, जो अपराधियों के हौसले बुलंद करता है।
‘रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स’ की 2025 की रिपोर्ट में भारत की स्थिति पर टिप्पणी साफ़ है।
*2014 के बाद से भारत की मीडिया एक अनौपचारिक आपातकाल की स्थिति में आ गई है!*
* ऑनलाइन उत्पीड़न,धमकियाँ और शारीरिक हमले सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों का नियति बन चुके हैं।
* मनमानी गिरफ्तारी और आपराधिक मुकदमे सच्चाई दबाने के नए हथियार हैं।
हाल ही में हुए हमले और हत्याएँ—जैसे छत्तीसगढ़ के मुकेश चन्द्राकर (अवैध रेत खनन पर काम करते हुए), दैनिक जागरण के राघवेंद्र बाजपेयी, ओडिशा के नरेश (भ्रष्टाचार उजागर करते हुए), और उत्तराखंड के राजीव प्रताप—यह सिद्ध करते हैं कि ईमानदार पत्रकार होने की कीमत जान से चुकानी पड़ रही है। पिछले दस वर्षों में मारे गए ज्यादातर पत्रकार पर्यावरण संबंधी मुद्दों (खनन, माफिया) पर सवाल उठा रहे थे।
*महिलाओं के लिए दोहरी चुनौती*
मीडिया के इस पुरुष प्रधान पेशे में महिला पत्रकारों को दोहरी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। ऑनलाइन और ऑफलाइन यौन उत्पीड़न,लैंगिक भेदभाव, घृणास्पद भाषण और शारीरिक हिंसा उन्हें लगातार झेलनी पड़ती है।
* ‘सुली डील्स’ और ‘बुल्ली बाई’ जैसे ऐप पर महिला पत्रकारों की ऑनलाइन नीलामी भारत में ऑनलाइन हिंसा के वैश्विक संकट का प्रतीक है।
* यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी दुनिया में 75% महिला पत्रकारों को ऑनलाइन अब्यूज का सामना करना पड़ता है।
* गौरी लंकेश की 2017 में हत्या, सौम्या विश्वनाथन और अन्य महिला पत्रकारों पर हमले, यह दिखाते हैं कि उनके लिए कार्यस्थल के भीतर और बाहर दोनों जगह खतरे मौजूद हैं।
*आवाज़ उठाने का समय!*
रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (RSF) के 2025 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत का 180 देशों में से 159वाँ स्थान हमारी लगातार गिरती साख का प्रमाण है।
आज पत्रकारिता जगत के संगठनों की चुप्पी चिंताजनक है। यदि पत्रकार संगठन इसी तरह खामोश रहे तो स्वतंत्र पत्रकारिता का गला घोंट दिया जाएगा और नागरिकों के मुद्दों को उठाने वाले ख़त्म हो जाएँगे। प्रेस क्लब ऑफ इंडिया जैसी संस्थाओं का विरोध प्रदर्शन अपनी जगह है, लेकिन हमें एकजुट होकर इन हालातों का सामना करना होगा।
*हम पत्रकार जनता के सेवक हैं। हमारी सुरक्षा सिर्फ़ हमारा नहीं, बल्कि लोकतंत्र और जनता के अधिकारों का भी मुद्दा है।*
यह समय है कि जनता, लोकतंत्र के इस चौथे स्तंभ को बचाने के लिए अपना समर्थन दे,ताकि हम बिना किसी डर के सत्ता को जवाबदेह ठहरा सकें और राजनीतिक हमलों पर रोक लग सके। अन्यथा, एक-एक करके पत्रकार को निशाना बनाया जाएगा, और देश तानाशाही की तरफ एक और कदम बढ़ा देगा! क्या हम यह होने देंगे?




